जम्मू कश्मीर में पीडीपी और भाजपा गठबंधन टूटने के बाद राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. और राष्ट्रपति शासन के लगते ही सेना ने आतंकवादियों से निपटने की अपनी तैयारियों को पुख्ता करते हुए एक्शन में आ गयी. सेना की गतिविधियों के शुरू होते ही आतंकियों और अलगाववादियों में हड़कंप मचना स्वाभाविक था, जो शुरू हो गया. पर जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है वो है देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी का दहशत में आना या फिर दहशतगर्दों का समर्थन करना. हाल ही में काँग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने सेना के ऊपर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जम्मू कश्मीर में चार आतंकी के साथ 20 निर्दोष लोगों को मारा जा रहा है. इसके तुरंत बाद लश्कर की ओर से आतंकी महमूद शाह ने बयान देते हुए राष्ट्रपति शासन की न सिर्फ निंदा की बल्कि लिखित बयान जारी कर बाकायदा गुलाम नबी आज़ाद का नाम लेते हुए समर्थन किया और कहा कि जम्मू और कश्मीर के मामले में उनका भी स्टैंड वही है जो काँग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद तथा अन्य काँग्रेस नेताओं का है.
यूँ तो गुलाम नबी के इस बयान और उसके बाद आये लश्कर के समर्थन को लेकर भाजपा के सभी नेताओं ने अपना आक्रोश जाहिर किया है. लेकिन, जो बात सबसे ज्यादा परेशान करती है वो ये है कि देश की बाँकी विपक्षी पार्टियों ने इस मामले में एक मतलबी चुप्पी साध राखी है. तो, क्या अब ये मान लिया जाए कि राजनीति और सत्ता पाने के लिए देश के विपक्ष को देशद्रोहियों से हाथ मिलाने और उनकी भाषा बोलने में भी कोई शर्म या गुरेज नहीं है? किसी को भी बुरा नहीं लग रहा कि गुलाम नबी के एक बयान ने देश के दुश्मनों को कितनी ताक़त दी है? बहरहाल,भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने इस बयान की बाबत क्या कहा आप भी देखें.
वैसे बताते चलें कि आतंकियों पर नकेल कसने के लिए दो विशेष अधिकारी बी वी आर सुब्रमण्यम और विजय कुमार को जम्मू-कश्मीर बुलाया गया है. सुब्रमण्यम कि गणना देश के एक ऐसे योग्य अधिकारी के रूप में होती है जिन्हें नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शान्ति स्थापित करने का खासा अनुभव है और विजय कुमार के नेतृत्व वाली टीम ने ही दक्षिण के मशहूर और कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन का अंत किया था. सुब्रमण्यम को जम्मू कश्मीर राज्यपाल का मुख्य सचिव तथा विजय कुमार को राज्यपाल का मुख्य सलाहकार बनाया गया है.
इन विशेष अधिकारियों, सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों के संयुक्त अभियान और प्रयास घाटी में कितने कारगर होंगे तथा जम्मू-कश्मीर की समस्या का समाधान किस हद तक संभव हो सकेगा ये अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन, देश के सामने देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी काँग्रेस का जो वीभत्स चेहरा उजागर हुआ है वो वाकई चिंता में डालने वाली है. और इससे भी ज्यादा चिंता में डालनेवाली है उन तथाकथित बुद्धिजीवियों की खामोशी जो कभी मोमबत्ती तो कभी तख्ती लेकर देश और दुनिया को ये बताने के लिए आतुर रहते हैं कि हमारे यहाँ कितनी असहिष्णुता बढ़ रही है?
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