"मुस्लिम तुष्टीकरण" भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाये तो आज़ादी के समय से ही ऐसा होता आ रहा है, और भारत की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से अपने हानि-लाभ का ध्यान रखते हुये ऐसा करती आ रही हैं। हालाँकि ये बात दीगर है कि इतने सालों से राजनीति पोषित होने के बावजूद भी भारत के सामान्य मुसलमानों के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं आ सका है। चुनावों में फायदा लेने की नीयत से धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव अथवा तुष्टीकरण को भारत में एक जमाने से "धर्मनिरपेक्षता" का नाम दिया जाता रहा है।
अभी हाल ही में हुये कर्नाटक विधान सभा के चुनाव के परिणामों के बाद भारत की सभी विपक्षी दलों को शायद ये एहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का अकेले मुक़ाबला करने की औकात किसी भी राजनैतिक दल की नहीं। तो बेशक, वो सारी पार्टियाँ जो कभी एक-दूसरे की धुर-विरोधी थी, आज एक दूसरे के साथ हाथ-में-हाथ और कंधा-से-कंधा मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मुकाबला करने का निर्णय कर लिया। इसकी शुरुआत के तौर पर पहले कर्नाटक में सीटों के गणित में भाजपा को पछाड़ने और राज्य की सत्ता पाने के लिए जेडीएस और काँग्रेस का गठजोड़ किया। फिर इसी गणित के आधार पर हाल ही में चौदह उपचुनाव लड़े गए जिसमें भाजपा को हराने में विपक्ष सफल हुआ। इन सारी कवायदों में बहाने के तौर पर "धर्मनिरपेक्षता" ही रही है।
अब इस गठबंधन को वक़्त की आवश्यकता और तर्कसंगत बताने के लिए इन राजनैतिक पार्टियों के पास एक ही हथियार बचा है और वो है "धर्मनिरपेक्षता"। इन सभी पार्टियों की राजनैतिक विवशता है कि वो आपस में विलय नहीं कर सकते, क्योंकि इन सभी पार्टियों का जन्म ही काँग्रेस के विरोध से हुआ है और सबों के राजनैतिक आधार का मूल "मुस्लिम तुष्टिकरण" ही है। अब जबकि ये सारी पार्टियाँ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी तो ये भी तय है कि ये सारी पार्टियाँ अपने-अपने राजनैतिक भविष्य के मद्देनजर इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगी कि उनका "मुस्लिम जनाधार" उनके साथ ही रहे। और चूँकि काँग्रेस सहित गठबंधन की सभी पार्टियाँ अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं तो ये निश्चित ही है कि सबों की नज़र मुस्लिम मत-दाताओं पर सबसे खास रहने वाली है।
रमज़ान का महीना चल रहा है और ऐसी संभावना है कि अगले साल के रमज़ान से पहले ही चुनाव सम्पन्न भी हो जाएँ, इस लिहाज़ से इफ्तार वाली राजनीति के साथ ही अगले चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियाँ जुट गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा इन सबों से अलग रहने वाली है। भाजपा का अपना तर्क है कि उसने जो भी विकास के कम किए हैं उसमें हिन्दू या मुसलमान में कोई भेद-भाव किए बगैर किया है, साथ ही तीन तलाक जैसे मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं के वोट के माध्यम से मुस्लिम वोटों में से अपना शेयर निकालने की कोशिश भाजपा भी उतने ही ज़ोर-शोर से करने की तैयारी में है।
तो ऐसे में हैरत नहीं होगी कि अगले चुनाव में हर तरफ से अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा का शोर सुनाई दे।



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