2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है

"मुस्लिम तुष्टीकरण" भारतीय राजनीति के लिए कोई नई बात नहीं है। यदि देखा जाये तो आज़ादी के समय से ही ऐसा होता आ रहा है, और भारत की लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से अपने हानि-लाभ का ध्यान रखते हुये ऐसा करती आ रही हैं। हालाँकि ये बात दीगर है कि इतने सालों से राजनीति पोषित होने के बावजूद भी भारत के सामान्य मुसलमानों के शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं आ सका है। चुनावों में फायदा लेने की नीयत से धर्म के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव अथवा तुष्टीकरण को भारत में एक जमाने से "धर्मनिरपेक्षता" का नाम दिया जाता रहा है। 

Rahul Gandhi Getting Ready For Iftar Party

अभी हाल ही में हुये कर्नाटक विधान सभा के चुनाव के परिणामों के बाद भारत की सभी विपक्षी दलों को शायद ये एहसास हो गया कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा का अकेले मुक़ाबला करने की औकात किसी भी राजनैतिक दल की नहीं। तो बेशक, वो सारी पार्टियाँ जो कभी एक-दूसरे की धुर-विरोधी थी, आज एक दूसरे के साथ हाथ-में-हाथ और कंधा-से-कंधा मिलाकर आगामी चुनावों में भाजपा का मुकाबला करने का निर्णय कर लिया। इसकी शुरुआत के तौर पर पहले कर्नाटक में सीटों के गणित में भाजपा को पछाड़ने और राज्य की सत्ता पाने के लिए जेडीएस और काँग्रेस का गठजोड़ किया। फिर इसी गणित के आधार पर हाल ही में  चौदह उपचुनाव लड़े गए जिसमें भाजपा को हराने में विपक्ष सफल हुआ। इन सारी कवायदों में बहाने के तौर पर "धर्मनिरपेक्षता" ही रही है। 


Rahul Gandhi In Muslim Costume

अब इस गठबंधन को वक़्त की आवश्यकता और तर्कसंगत बताने के लिए इन राजनैतिक पार्टियों के पास एक ही हथियार बचा है और वो है "धर्मनिरपेक्षता"। इन सभी पार्टियों की राजनैतिक विवशता है कि वो आपस में विलय नहीं कर सकते, क्योंकि इन सभी पार्टियों का जन्म ही काँग्रेस के विरोध से हुआ है और सबों के राजनैतिक आधार का मूल "मुस्लिम तुष्टिकरण" ही है। अब जबकि ये सारी पार्टियाँ एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगी तो ये भी तय है कि ये सारी पार्टियाँ अपने-अपने राजनैतिक भविष्य के मद्देनजर इस बात का पूरा-पूरा ख्याल रखेंगी कि उनका "मुस्लिम जनाधार" उनके साथ ही रहे। और चूँकि काँग्रेस सहित गठबंधन की सभी पार्टियाँ अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं तो ये निश्चित ही है कि सबों की नज़र मुस्लिम मत-दाताओं पर सबसे खास रहने वाली है। 

political iftar party


रमज़ान का महीना चल रहा है और ऐसी संभावना है कि अगले साल के रमज़ान से पहले ही चुनाव सम्पन्न भी हो जाएँ, इस लिहाज़ से इफ्तार वाली राजनीति के साथ ही अगले चुनाव की तैयारियों में सभी पार्टियाँ जुट गई हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा इन सबों से अलग रहने वाली है। भाजपा का अपना तर्क है कि उसने जो भी विकास के कम किए हैं उसमें हिन्दू या मुसलमान में कोई भेद-भाव किए बगैर किया है, साथ ही तीन तलाक जैसे मुद्दे को लेकर मुस्लिम महिलाओं के वोट के माध्यम से मुस्लिम वोटों में से अपना शेयर निकालने की कोशिश भाजपा भी उतने ही ज़ोर-शोर से करने की तैयारी में है। 

तो ऐसे में हैरत नहीं होगी कि अगले चुनाव में हर तरफ से अल्लाह के नाम पे दे दे बाबा का शोर सुनाई दे।  

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