चार दिन पहले राहुल गाँधी का मुसलमान बुद्धिजीवियों से गुप्त मीटिंग करना, उक्त मीटिंग में मुसलमान बुद्धिजीवियों से कथित रूप से गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान मंदिरों में जाने को लेकर माफ़ी मांगना और उन्हें आश्वस्त करते हुए ये ऐलान करना कि हाँ--काँग्रेस मुसलमानों की ही पार्टी है. उसके एक दिन बाद मुसलमानों की संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा देश भर में शरिया क़ानून लागू करने की मांग करना, और इसके एक दिन बाद काँग्रेस के बड़े और बुद्धिजीवी समझे जानेवाले नेता शशि थरूर द्वारा ये कहा जाना कि यदि 2019 के चुनाव में भाजपा इसी तरह पूर्ण बहुमत से दुबारा जीतती है तो देश का संविधान खतरे में आ जाएगा और भारत एक "हिन्दू - पाकिस्तान" में तब्दील हो जाएगा. फिर, इसके एक दिन बाद काँग्रेस द्वारा शशि थरूर के बयान से किनारा करना कि ये उनके निज़ी विचार हैं और काँग्रेस का इससे कुछ लेना-देना नहीं. क्या ये सब अलग-अलग घटनाएं हैं और इनका आपस में कोई सम्बन्ध या लेना-देना नहीं? अगर इत्तेफाक से आप ऐसा ही सोचते हैं तो शायद आप गलत हैं.
दरअसल, ये सारी घटनाएं एक-दुसरे से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं और काँग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं. काँग्रेस पार्टी को आगामी चुनाव में न तो किसी पार्टी से सहयोग का भरोसा है, न ही उसके पास अपना खुद का इतना जनाधार बचा है कि वो अपने अकेले के दम पर आगामी 2019 का चुनाव लड़ सके. काँग्रेस के महागठबंधन की परिकल्पना भी काँग्रेस के खुद के हक़ में नहीं हो पा रही थी. क्योंकि, यदि महागठबंधन बन भी जाता तो उसमें काँग्रेस की हैसियत एक पिछलग्गू से अधिक की नहीं होती. ऐसी स्थिति में, काँग्रेस को महागठबंधन की अनिश्चितता से उबारने या फिर महागठबंधन में अपनी हैसियत बढाने और अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण के सिवा दूसरा और कोई विकल्प बचा ही नहीं था. और, इस काम में उसे साथ देने के लिए नए सहयोगी तलाशने की ज़रुरत नहीं थी. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से काँग्रेस का रिश्ता बहुत ही पुराना रहा है.
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस मांग को जम्मू और कश्मीर के डिप्टी ग्रैंड मुफ़्ती नासिर उल इस्लाम ने सीधे हाथों से लपकते हुए एक कदम आगे बढ़ते हुए ये बयान दे डाला कि अगर भारत में रहनेवाले मुसलामानों को शरिया अदालत बनाने की इजाज़त नहीं दी जाती, तो उन्हें एक अलग मुल्क बनाकर दे दिया जाए. बात यहीं पर नही रुक रही. भाजपा ने जहाँ इन तमाम बातों को देशविरोधी, हिंदुविरोधी और साम्प्रदायिक सौहाद्र को भंग करने वाला बताते हुए इसका ज़बरदस्त विरोध किया है, वहीं पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने AIMPLB की मांग को जायज़ ठहराते हुए आग में घी डालने का काम कर दिया है. तो ऐसा करके क्या हामिद अंसारी काँग्रेस के एहसानों का क़र्ज़ अदा कर रहे हैं ? ज़रूर पढ़िए हमारा अगला पोस्ट.
काँग्रेस की इन सारी कवायदों का उसे कितना लाभ मिलेगा ये तो आने वाले चुनाव परिणामों से ही पता चलेगा लेकिन, हमने अपने 6 अप्रैल के पोस्ट में जो आशंका जताई थी वो तो अभी से ही सच होती दिख रही है.
जरूर पढ़ें -- 2019 चुनाव : क्या अब अल्लाह ही मालिक है
ये भी पढ़ें -- हाँ, काँग्रेस मुसलमानों की पार्टी : राहुल गाँधी
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